*सज्जन सिंह रंगरूट: वह शेर जिसने पहले विश्व यूद्ध में इतिहास रच दिया*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*सज्जन सिंह रंगरूट: वह शेर जिसने पहले विश्व यूद्ध में इतिहास रच दिया*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) सन1914 का दौर था। पूरा यूरोप प्रथम विश्व युद्ध की भयानक आग में जल रहा था। पश्चिमी मोर्चे पर ब्रिटिश आर्मी के बड़े-बड़े गोरे जनरल पंजाब के एक सीधे-साधे सिख लड़के को देखकर हंस रहे थे और उसकी पगड़ी का मजाक उड़ाते हुए ललकार रहे थे कि ये रंगरूट क्या जर्मनी की आधुनिक तोपों का सामना करेगा? लेकिन उन अंग्रेजों को अंदाजा भी नहीं था कि उन्होंने किस शेर को ललकार दिया है? पंजाब के दलोवाल गांव से निकला वीर योद्धा को जाने तो पंजाब के जिला अमृतसर के एक छोटे से गांव दलोवाल (Dalowal) में सन 1888 में जन्मे सुबेदार सज्जन सिंह एक साधारण से पंजाबी ग्रामीण थे। सिख राजपूत परिवार में पले-बढ़े इस युवा की शारीरिक शक्ति और साहस की कहानियाँ पूरे इलाके में मशहूर थीं। उनका मकसद सिर्फ नौकरी पाना नहीं था बल्कि उन्हें उम्मीद थी कि इस जंग में अपनी बहादुरी दिखाकर वे अंग्रेजों को भारत आजाद करने पर मजबूर कर देंगे। बात ब्रिटिश इंडियन आर्मी और लाहौर रेजिमेंट की। सज्जन सिंह ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी की लाहौर रेजिमेंट में एक रंगरूट के रूप में भरती हुए। यहाँ ''रंगरूट''शब्द अंग्रेजी के''Recruit''का पंजाबी रूप है। उनकी रेजिमेंट में सुबेदार जोरावर सिंह जैसे अनुभवी सैन्य अधिकारी थे। जो पूरी टुकड़ी के पिता-तुल्य थे और हमेशा जवानों का हौसला बढ़ाते थे। यूरोप के मैदान में भेदभाव और अपमान के मद्देनजर जब उनकी रेजिमेंट यूरोप के पश्चिमी मोर्चे पर पहुँची तो गोरे अंग्रेज अफसरों ने उनके साथ इंसानों जैसा बरताव तक नहीं किया। उन्हें घटिया राशन दिया गया। उनके पहनावे, दाढ़ी और पगड़ी का मजाक उड़ाया गया। एक अंग्रेज सैनिक ने उनसे पूछा कि क्या तुम्हें राइफल चलाना भी आता है? तो सज्जन सिंह ने करारा जवाब दिया कि हमें तुम जैसों को फाड़ने के लिए राइफल की जरूरत नहीं। हम अपने नंगे हाथों से भी प्रहार कर सकते हैं। फ्रांस के बर्फीले बंकरों में परीक्षा हुई। फ्रांस के कीचर और हड्डियों को जमा देने वाले बर्फीले बंकरों में उन्हें उतारा गया। सामने दुनिया की सबसे आधुनिक जर्मन सेना खड़ी थी। जो लगातार तोपों और मशीनगनों से आग बरसा रही थी। पहली ही भिड़ंत में सज्जन सिंह के कई करीबी दोस्त और साथी जवान उनकी आँखों के सामने गोलियों से भून दिए गए। इस भयानक नरसंहार ने उन्हें झकझोर दिया और उनके मन में सवाल उठे"क्या अंग्रेज हमारे द्वारा बहाए गएं इस खून की कद्र करेंगे? क्या वे पंजाब को आज़ाद करेंगे?"गद्दारी का प्रस्ताव और करारा जवाब के मद्देनजर जर्मन सेना को जब पता चला कि सिख सैनिक अंग्रेजों की तरफ से लड़ रहे हैं तो उन्होंने एक सीक्रेट लेटर भेजा।"अंग्रेजों का साथ छोड़ो और हमारी तरफ आ जाओ। हम तुम्हें ज़्यादा पैसा और इज़्ज़त देंगे। बेहतर राशन,हथियार और ऊँची तनख्वाह देंगे"लेकिन सज्जन सिंह ने गरजते हुए जवाब दिया कि सिख जान दे सकता है लेकिन गद्दारी कभी नहीं कर सकता। उनके लिए वफादारी और इज़्ज़त किसी भी पैसे से बढ़कर थी। बैसाखी के दिन आत्मघाती हमला हुआ। कई महीनों तक खाइयों में फँसे रहने के बाद जब एक दिन मेला सिंह ने सज्जन को बताया कि बैसाखी का त्योहार है तो सज्जन सिंह ने अपने साथियों का हौंसला बढ़ाने के लिए गीत गाया लेकिन यह बैसाखी दु:खद थी। टीजा और धीरा जैसे करीबी दोस्त पहले ही शहीद हो चुके थे। इसके बाद सज्जन सिंह ने पीछे हटने के बजाए अकेले ही पूरे युद्ध का पासा पलटने का आत्मघाती फैसला लिया।"बोले सो निहाल,सत श्री अकाल"का जयकारा लगाते हुए वे अकेले ही बम और बंदूक लेकर गोलियों की भयंकर बौछार के बीच दुश्मन की खाई में घुस गए। उन्होंने अकेले ही दुश्मन की पूरी टुकड़ी को तबाह कर दिया और हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया लेकिन इस अदम्य वीरता में सज्जन सिंह स्वयं भी शहीद हो गए। अंग्रेजों से लेकर पूरी दुनिया ने इस यौद्धा को सलाम की। सज्जन सिंह की इस शहादत और अदम्य साहस को देखकर उनके मजाक उड़ाने वाले गोरे जनरल भी इस वीर के कदमों में नतमस्तक हो गए। ब्रिटिश और भारतीय दोनों ने मिलकर सज्जन सिंह को श्रद्धांजलि दी। उनके सुबेदार जोरावर सिंह की कहानी आज भी उनके परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती है। प्रथम विश्व युद्ध में कुल 15 लाख भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई। उनकी वीरता की यह कहानी। एक साधारण से रंगरूट ने अपनी अदम्य वीरता से रची और आज भी हर हिंदुस्तानी को गर्व से भर देती है। सज्जन सिंह से जुड़े तथ्य (संक्षिप्त) के मद्देनजर विवरण व जानकारी पूरा नाम सुबेदार सज्जन सिंह,जन्म वर्ष 1888,गाँव दलोवाल (Dalowal), जिला अमृतसर, पंजाब,समुदाय सिख राजपूत,रेजिमेंट ब्रिटिश इंडियन आर्मी की लाहौर रेजिमेंटपद सुबेदार (Subedar),युद्ध प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918),पश्चिमी मोर्चा शहादत,दुश्मन की खाई पर अकेले हमला करते हुए।(Photos Courtesy Social media and AI)

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