*बलूचिस्तान की आज़ादी की घोषणा:मीर यार बलोच ने X पर साझा किया‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’का पत्र,जानें पूरा ऐतिहासिक संदर्भ और मौजूदा दावे*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*बलूचिस्तान की आज़ादी की घोषणा:मीर यार बलोच ने X पर साझा किया‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’का पत्र,जानें पूरा ऐतिहासिक संदर्भ और मौजूदा दावे*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई


(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई) बलूच नेता मीर यार बलोच द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर‘'रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान'’का एक पत्र साझा कर यह दावा किया गया है कि बलूचिस्तान ने पाकिस्तान से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी है। इस पत्र में कहा गया है कि‘'मा चुकेन बलोचानी'’ को राष्ट्रीय गान,बलूचिस्तान के पारंपरिक ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज और‘'बलोची फलूस'’को राष्ट्रीय मुद्रा घोषित किया गया है साथ ही यह भी दावा किया गया कि 85 प्रतिशत क्षेत्र पर बलूच स्वतंत्रता समर्थक ताकतों का नियंत्रण है। इस घोषणा के ऐतिहासिक और समसामयिक महत्व को विस्तार से समझना आवश्यक है। बलूचिस्तान का भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिदृश्य अत्यंत जटिल है। यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी एशिया में फैला हुआ है। जो वर्तमान में तीन देशों पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत,ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत और अफगानिस्तान के निमरूज प्रांत में विभाजित है। यहां की अधिकांश आबादी बलूच जनजातियों की है। जो मुख्यतःसुन्नी मुस्लिम हैं और "बलूची"भाषा बोलते हैं। क्षेत्र में "ब्राहुई"और"पश्तून"समुदायों की भी उल्लेखनीय उपस्थिति है। ऐतिहासिक संदर्भ पर गौर करें तो सन1666 से साल 1948 तक यह क्षेत्र स्वतंत्र रियासतों, विशेषकर "कलात खानत"  के समूह के रूप में अस्तित्व में था। 

साल 1947 में भारत विभाजन और ब्रिटिश शासन की समाप्ति के समय "कलात"के खान मीर अहमद यार खान ने 15 अगस्त1947 को बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा की थी हालांकि पाकिस्तान ने 27 मार्च 1948 को सैन्य बल का प्रयोग कर इसे अपने अधिकार में मिला लिया था। साल 1970 में इसे पाकिस्तान का चौथा प्रांत बनाया गया लेकिन बलूच राष्ट्रवादी नेता आरोप लगाते रहे हैं कि यह एक सैन्य कब्जे के तहत हुआ था। बलूचिस्तान में आजादी की मांग और सशस्त्र संघर्ष का इतिहास दशकों पुराना है। साल 1948 के प्रथम विद्रोह में खान ऑफ कलात के भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने पाकिस्तानी कब्जे के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया। जिसे कुचल दिया गया। साल 1958-59 का दूसरा बड़ा विद्रोह नवाब नौरोज खान के नेतृत्व में हुआ। जिसमें बलूच गुरिल्लाओं ने पाकिस्तानी सेना को कड़ी चुनौती दी। इसके बाद साल 1973-77 का तीसरा विद्रोह सबसे संगठित और लंबा संघर्ष था। जिसमें 50 हजार से अधिक बलूच लड़ाकों और 30 हजार पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती हुई थी। 



साल 2004 से अब तक चौथा विद्रोह जारी है। जिसमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA),बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (BRA) और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) जैसे संगठन सक्रिय हैं। पाकिस्तानी राज्य द्वारा बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के आरोप लगते रहे हैं। जिनमें जबरन गायब करना,अतिरिक्त न्यायिक हत्याएं और सामूहिक सजा शामिल हैं। बलूच कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियां व्यवस्थित रूप से बलूच युवाओं को निशाना बनाती हैं। पाकिस्तान के अनुसार बलूचिस्तान में अस्थिरता के लिए विदेशी शक्तियां जिम्मेदार हैं। जो बलूच विद्रोह को समर्थन देकर क्षेत्र को अस्थिर करना चाहती हैं। मीर यार बलोच का 85 प्रतिशत क्षेत्र पर नियंत्रण का दावा अत्यधिक विवादास्पद है। 



स्वतंत्र विशेषज्ञों के अनुसार बलूच विद्रोही मुख्यतःदूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों में सक्रिय हैं। जहां सरकारी पहुंच सीमित है। प्रमुख शहर क्वेटा,ग्वादर,तुरबत और खुजदार पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के नियंत्रण में हैं। बलूचिस्तान का रणनीतिक महत्व ग्वादर पोर्ट,चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) खनिज संपदा और ऊर्जा संसाधनों के कारण अत्यधिक है। यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत होने के साथ- साथ सबसे कम आबादी वाला और सबसे अधिक प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है। हाल की घोषणा को पाकिस्तान सरकार ने खारिज कर दिया है तथा इसे सोशल मीडिया का दुष्प्रचार करार दिया है। बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री ने कहा है कि प्रांत पाकिस्तान का अभिन्न अंग है और रहेगा। बलूच कार्यकर्ताओं और प्रवासी समुदाय ने घोषणा का स्वागत किया है लेकिन कुछ ने इसके समय और प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस पर तटस्थ रुख अपनाया है।



मीर यार बलोच का यह दावा बलूच स्वतंत्रता आंदोलन में एक नया प्रतीकात्मक अध्याय जोड़ता है लेकिन इसकी व्यावहारिक वास्तविकता अत्यधिक सीमित है। जमीनी स्तर पर पाकिस्तानी राज्य का प्रभुत्व बरकरार है। यह विकास बलूच मुद्दे पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करने की एक रणनीतिक कोशिश प्रतीत होती है। स्थिति बेहद तरल है और क्षेत्र में हिंसा व तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सत्यता की पुष्टि के लिए स्वतंत्र स्रोतों से जानकारी का इंतजार करना ही उचित होगा।(Photos Courtesy Social media and AI)

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