*निडर हिंदुस्तानी बेटी नूर इनायत ख़ान:जब मैसूर के शेर की इस वंशज ने हिटलर को दी थी चुनौती!*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*निडर हिंदुस्तानी बेटी नूर इनायत ख़ान:जब मैसूर के शेर की इस वंशज ने हिटलर को दी थी चुनौती!*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की वंशज और हिटलर की नाज़ी सेना को चुनौती देने वाली निडर हिंदुस्तानी बेटी नूर इनायत ख़ान की कहानी। मॉस्को से लंदन तक एक राजकुमारी की अनोखी यात्रा जाने तो नूर इनायत ख़ान का जन्म साल 1914 में रूस की राजधानी मॉस्को में हुआ था। उनकी मां अमेरिकी थीं और पिता हज़रत इनायत ख़ान एक प्रसिद्ध सूफ़ी संगीतकार थे लेकिन सबसे खास बात यह थी कि वह टीपू सुल्तान के भाई की चौथी पीढ़ी से ताल्लुक रखती थीं। भले ही उनका जन्म भारत से दूर हुआ लेकिन उनकी रगों में ''मैसूर के शेर''का वही बहादुरी का खून बहता था। जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत को चुनौती दी थी।
पेरिस में पली-बढ़ी 'मैडलीन' बनीं ब्रिटेन की पहली महिला मुस्लिम एजेंट। नूर का पालन-पोषण पेरिस में हुआ था। जहां उन्होंने पेरिस विश्वविद्यालय से बाल मनोविज्ञान की पढ़ाई की थी और बच्चों की किताबें लिखने वाली एक सफल लेखिका बनीं थीं। साल1940 में जब नाज़ियों ने फ्रांस पर कब्ज़ा किया तो वह अपने परिवार के साथ इंग्लैंड भाग गईं थीं । ब्रिटिश सेना ने उनकी फ्रांसीसी भाषा की अच्छी जानकारी देखकर उन्हें स्पेशल ऑपरेशंस एक्जीक्यूटिव (SOE) में शामिल कर लिया था । साल 1943 में उन्हें ''मैडलीन'' Madeleine कोड नेम से नाज़ियों के कब्जे वाले फ्रांस में पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर के रूप में भेजा गया था । उनका हिटलर की सेना के सामने अटूट हौसला देखें तो फ्रांस में उनका काम बेहद खतरनाक था। वायरलेस ऑपरेटरों की जीवन प्रत्याशा मात्र छह सप्ताह होती थी लेकिन नूर ने न केवल यह समय पार किया बल्कि जब उनका पूरा नेटवर्क नष्ट हो गया था ।
तब भी वह पेरिस में लंदन और फ्रांसीसी प्रतिरोध के बीच आखिरी कड़ी बनी रही थी। उन्हें ब्रिटेन लौटने का मौका दिया गया लेकिन उन्होंने अपना मिशन जारी रखा था। एक बार उन्होंने लंदन को संदेश भेजा कि वह अपने काम का आनंद ले रही हैं और इस अवसर के लिए आभारी हैं। दौरान गिरफ्तारी,यातनाएं और आखिरी शब्द ''लिबर्टी'' के हिसाब से साल 1944 में एक साथी के विश्वासघात के कारण नूर को "गेस्टापो" ने गिरफ्तार कर लिया था। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के दौरान भी हिम्मत नहीं हारी थी। एक बार उन्होंने नहाने का बहाना करके गेस्टापो मुख्यालय की छत पर चढ़कर भागने की कोशिश की थी । कठोर पूछताछ और यातनाओं के बावजूद उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी थी ।
13 सितंबर 1944 को जर्मनी के दखाऊ कंसंट्रेशन कैंप में महज़ 30 साल की उम्र में उन्हें गोली मार दी गई थी । उनके आखिरी शब्द थे ।"Liberté"(आज़ादी)! सर्वोच्च सम्मान और अमर विरासत के मद्देनजर उनकी बहादुरी के लिए ब्रिटेन ने मरणोपरांत "जॉर्ज क्रॉस" और फ्रांस ने "क्रोइक्स डी ग्युरे"से सम्मानित किया था । साल 2012 में लंदन के गॉर्डन स्क्वायर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। यह किसी एशियाई महिला की पहली स्टैंड-अलोन प्रतिमा थी। सलाम है नूर इनायत ख़ान को, एक ऐसी वीरांगना जिसने साबित किया कि साहस किसी एक देश,धर्म या भाषा की जागीर नहीं होता।
नूर इनायत ख़ान की कहानी सिर्फ़ बहादुरी की नहीं बल्कि विरोधाभासों को समेटे एक अद्भुत जीवन की है। वह एक शांतिप्रिय सूफ़ी परिवार से थीं। जिन्होंने अहिंसा का पालन किया लेकिन उन्होंने दुनिया की सबसे ख़तरनाक जासूसी मुहिम में हिस्सा लिया था। एक ''असंभव''जासूस के जन्म के मद्देनजर नूर कोई साधारण जासूस नहीं थीं। उनका पालन-पोषण संगीत, आध्यात्मिकता और साहित्य के माहौल में हुआ। उन्होंने बाल मनोविज्ञान की पढ़ाई की और बच्चों के लिए कहानियाँ लिखीं थीं।
उनके प्रशिक्षकों को भी उनकी क्षमताओं पर संदेह था। एक रिपोर्ट में कहा गया कि वे "बहुत स्त्रैण"हैं।"धोखेबाज़ी"पसंद नहीं है और हथियारों से "काफी डरती" हैं। उन्हें यह भी लगा कि वे भीड़ में आसानी से नहीं घुल-मिल पाएंगी। एक प्रशिक्षक ने तो यहाँ तक लिखा कि वे "बिना इसके मायने समझे"आ गई हैं लेकिन SOE के प्रमुख मौरिस बकमास्टर ने इन आशंकाओं को "बकवास" करार दिया था। उनका जानलेवा मिशन था और अकेली होकर जंग लडनी थी। साल 1943 में उन्हें नाज़ी-कब्जे वाले पेरिस में भेजा गया था। यह काम इतना ख़तरनाक था कि एक वायरलेस ऑपरेटर की औसत जीवन प्रत्याशा मात्र छह सप्ताह थी। उनके साथी एजेंटों को गिरफ्तार कर लिया गया था और पेरिस में SOE का नेटवर्क लगभग खत्म हो गया था। लंदन ने उन्हें वापस बुलाने का आदेश दिया था लेकिन नूर ने इनकार कर दिया था। उन्होंने अकेले ही छह रेडियो ऑपरेटरों का काम संभाला और फ्रांसीसी प्रतिरोध (Resistance) को ब्रिटेन से जोड़े रखने वाली आखिरी कड़ी बनी रहीं थी।
दौरान विश्वासघात,यातना और उनकाआखिरी शब्द देखें तो आखिरकार एक फ्रांसीसी महिला के विश्वासघात के कारण "गेस्टापो"ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। कैद के दौरान भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी। उसने दो बार भागने की कोशिश की थी लेकिन असफल रहीं थीं। नाज़ियों ने उन्हें एक साल से अधिक समय तक अकेले कैद में रखा था । भूखा रखा और बुरी तरह प्रताड़ित किया था लेकिन वे अपने साथियों और कोड के बारे में एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं हुईं थीं। 13 सितंबर 1944 को दखाऊ कंसंट्रेशन कैंप में महज़ 30 साल की उम्र में उन्हें गोली मार दी गई थी। तब उनका आखिरी शब्द था कि "Liberté"(आज़ादी)। सम्मान और विरासत के मद्देनजर उनकी अदम्य साहस के लिए ब्रिटेन ने उन्हें मरणोपरांत जॉर्ज क्रॉस (George Cross) से सम्मानित किया गया था। जो ब्रिटेन का सर्वोच्च नागरिक वीरता पुरस्कार है।
वे उन केवल तीन महिलाओं में से एक हैं। जिन्हें यह सम्मान मिला है। फ्रांस ने भी उन्हें Croix de Guerre (युद्ध क्रॉस) से नवाजा। साल 2012 में लंदन के गॉर्डन स्क्वायर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। जो किसी एशियाई या मुस्लिम महिला की पहली स्टैंड-अलोन प्रतिमा थी। हाल ही में उनके जॉर्ज क्रॉस पदक को RAF संग्रहालय लंदन में प्रदर्शित किया गया है। नूर इनायत ख़ान ने अपने जीवन से साबित किया कि साहस,देश,धर्म या पृष्ठभूमि की मोहताज नहीं होता। अपनी कोमल प्रकृति और अहिंसात्मक सोच के बावजूद उन्होंने अत्याचार के खिलाफ खड़े होकर सबसे बड़ी कुर्बानी दी थी। (Photos Courtesy Social media and AI)
~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √• Metro City Post• Digital World• #NoorInayatKhan #TipuSultan #WWIIHeroes #IndianHistory #WomenPower #UnsungHero #FreedomFighter #SOE #Bravery #InspiringWomen








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